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पिछले चार साल में शेयर बाजारों में पानी की तरह बहता रहा है धन...

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चार साल में शेयर बाजारों में पानी की तरह बहता रहा है धन... चार सौ गुना की बढ़ोतरी हुई है....भाजपा सरकार है या बनियों की सरकार..सोचिए....सरकार ने दावा किया था काले धन के प्रवाह को रोक दिया जाएगा...लेकिन बनियों के समर्थन पर बनी इस सरकार के आते ही नीतियों में बदलाव कर दिया गया। केवल चार साल में ही शेयर बाजार में दलालों की सक्रियता में उछाल आया और चार सौ गुना ज्यादा का निवेश शेयर बाजार में होने लगा। इस दौरान कॉर्पोरेट सेक्टर ने रोजगार के अवसरों को उपलब्ध कराने की बजाय शेयर बाजार में  निवेश करना ज्यादा मुफीद समझा....। देखिए शेयर बाजार के रिकॉर्ड क्या कहते हैं।           भाजपा सरकार की मदद से सटोरियों ने कारोबारियों और कॉर्पोरेट सेक्टर से 50 फीसदी रकम ज्यादा शेयर मार्केट में इन्वेस्ट करा दी है। साल 2014-15 में सालाना टर्नओवर बढ़कर 556,06,453.39 करोड़ रुपये हो गया। इसके बाद शेयर बाजार में पानी की तरह धन का प्रवाह बढ़ने लगा। भाजपा सरकार के दौरान शेयर मार्केट में आई उछाल का राज क्या है। यह एनएसई की रिपोर्ट से पता चल जाएगा। एनएसई के फ्यूचर और ऑप्शन स...

पत्थर के भगवानों से कुछ पाने की उम्मीद

पत्थर के भगवानों से कुछ पाने की उम्मीद अब जो हालात पैदा किए जा रहे हैं उससे प्रतीत होता है कि जिसने भी थोथी किताबों का विरोध किया, जिसने भी किस्से कहानियों पर उंगली उठाई, ऐसे पढ़े लिखे लोगों को अब शहरी आतंकवादी या वामपंथी घोषित कर दिया जाएगा , किया भी जा रहा है।  दुनिया नित नए अन्वेषण कर रही है, शोध कर रही है। प्रौद्योगिकी, विज्ञान, अंतरिक्ष, मेडिकल हर जगह अपना परचम लहरा रहे हैं। लेकिन हमारे सो कॉल्ड महान देश, जहां कभी वानर रीछ भालू गिद्ध व अन्य जानवर कभी संस्कृत बोला करते थे, हवा में उड़ सकते थे, धरती से 100 गुना प्रकाशवान गोले को, जिसे सूरज भगवान कहते हैं , उन्हें एक वानर बालक निगल जाता है, उस महान देश में इस तरह की कोरी कल्पनाओं में ही खुद को धन्य मानने की जुगाड़ लगाने में व्यस्त है। आज हमारे महान देस का वासी पत्थर के भगवानों से कुछ पाने की उम्मीद पाले बैठा है। किसी आश्चर्य चमत्कार होने की आस लगाए बैठा है। निर्जीव पत्थरों की मूरत में आस्था ढूंढता है। इस नकली आस्था के चक्कर में न जाने कितनी लाशें बिछा दी गई हैं, न जाने कितनों का खून बहा दिया गया है। असल में कुछ शातिर व स्वार्थी...

भारत में न्याय की देवी का नाम क्या है...

भारत में न्याय की देवी का नाम क्या है...   बचपन से ही पढ़ते और सुनते आ रहे हैं - न्याय में असमानता न हो इसलिए वे आँख पर पट्‍टी बाँधकर ही न्याय तौलती हैं। लेकिन तराजू का पलड़ा सम है- यह कैसे पता चल पाता होगा उन्हें। आंखें तो बंद हैं न्याय तौलनेवाली पत्थर की देवी के। तो फिर केवल बयान, तर्क वितर्क सुनकर ही निर्णय कैसे हो सकेगा न्याय का। झूठ का पलड़ा भारी ही रहता है, तो फिर सच कैसे मजबूत होगा। प्रयास को सफलता मिलेगी कैसे? यह देखने सुनने के बाद भी न्याय अन्याय का फैसला कैसे किया जा सकता है? कानून और कचहरी का जब भी जिक्र होता है, हमारे आंखों के सामने सफेद धवल न्याय की देवी की एक मूरत सामने होती है। साथ ही दिखाई देती है – मूरत की आँखों पर बंधी काली पट्टी, एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार धारी देवी की मोहक छवि। लेकिन भारत में न्याय की देवी का नाम क्या है, यह कोई नही जानता।         आँखों पर पट्टी का मतलब है सब को एक जैसा मानना, निष्पक्षता का पालन करना। तराजू का मतलब है किसी भी विषय या व्यक्ति के  गुण दोष को तौलना और फिर निर्णय देना। दूसरे देवी के हा...

नाम बदल कर काम करवाने का चलन

  नाम बदल कर काम करवाने का चलन आ ज कल का चलन हो गया है नाम बदल कर काम करवाने का। देखिए न पिछले कई दशकों सें पुराने शहरों के नाम बदले जा रहे हैं। हद तो यह है कि पिछली सरकारों के विकास दर भी बदले जा रहे हैं, विभागों के नाम बदले जा रहे हैं, योजनाओं के नाम तक बदल दिए गए। लेकिन किसी ने भी पुरानी दर पर न तो पेट्रोल मुहैया कराया, न तो सोना-चांदी के दाम ही कम कराए..इतना ही नहीं, पुरानी दर पर न तो किसी को प्रॉपर्टी मिल पा रही है और न ही जमीन जायदाद के दाम ही कम कर पाए हैं...जब पुराना ही लागू करना था तो जनता को जिसका लाभ मिलता, वह फैसला लिया जाता...   देखिए इलाहाबाद का पुराना नाम प्रयागराज था, उसे बदलकर साहब लोगों की पारटी ने प्रयागराज कर दिया। मुंबई का पुराना नाम बंबई और चेन्नई का पुराना नाम मद्रास था। कलकत्ता को कोलकाता बुलाया जाने लगा है। पुराने शहरों का नाम बदल दिया गया। देश के कई दूसरे शहरों के नाम भी बदले गए, लेकिन महान पार्टियों ने कभी पुराने पेट्रोल का दाम जो कभी 2 रुपए था, वह नहीं किया। सोने का दाम 250 रुपए तोला था, गेंहू-चावल 1 रुपये किलो मिलता था। उस कीमत पर महान स...

कलमकार के कई रूप यहां

कलमकार के कई रूप यहां कलमकार के कई रूप यहां कुछ नाम के कुछ काम के कुछ बिकते हैं कुछ लिखते यहां कुछ झुकते तो कुछ टूट ही जाते नाम है जिसका चाहे जितना कलम भी तीखी हो उसकी मुमकिन नहीं अाभासी इस दुनिया मे फरेब भी हो सकते हैं माया के बाजार में कलम भी देखो क्या रूप बदलती जादूगर के हाथ में पड़ कर हुनरमंद की कोई कदर नहीं सुनहरी स्याही मे तीखी कोई धार नहीं

कुछ सिरफिरे मुल्क में आग लगा रहे हैं

कुछ सिरफिरे मुल्क में आग लगा रहे हैं कुछ सिरफिरे मुल्क में आग लगा रहे हैं, कौन हैं वो अमन के स्वघोषित पुजारी जो मंदिरों-मस्जिदों में नफरत की आग जला रहे हैं मनसूबा ज़ालिमों का कामयाब न होगा राज ज़िन्दा रहेगी इंसानियत कैसे जब लोगों की अनायास ही जान जा रही है। बंद हो हैवानियत का नंगा नाच जाहिलों उस ईश्वर औ खुदा को मानते हो, जानते हो जिसे उसे क्या मुंह दिखाओगे 

कोई नहीं है सरहद के सिपाही से बड़ा

कोई नहीं है सरहद के सिपाही से बड़ा इक वो है जो संगीन लेकर मौत की छाती पर चढ़ा है। और अपने लहू से इस देश का महान इतिहास गढ़ा है। इक ये भी हैं, जो पत्थरों पर अपना माथा पटकते हैं, मंदिरों-मस्जिदों में जा-जाकर बूत पूजनेवालों ज़रा ध्यान से सुनो, कोई नहीं है सरहद के सिपाही से बड़ा। अपने स्वार्थ में होकर अंधे धृतराष्ट्र माफ नहीं करेगा तुम्हें कभी इतिहास बांटते हो इंसानों को लालच की खातिर परजीवी शैतान हो कपटी हो लालची भी। अन्नदाता औ देश का मजदूर भी देखो किस कदर हताश निराश हो रहे हैं रोज मौत को लगाते हैं गले अपनी तुम अट्टाहास करते हो जीत पर अपनी आर आऱ यादव

सरकारी फाइलों में मौत फंसी है झमेलों में

 सरकारी फाइलों में मौत                          फंसी है झमेलों में  सरकारी फाइलों में देखो तो मौत भी फंसी है पात्र और अपात्र के झमेलों में चुनकर भेजी गई सरकार के नुमाइंदे करते हैं कैसे कैसे अजूबे फैसले सरकारी फाइलों में अनगिनत लाशें आज भी राह देखते पड़ी है मुआवजों के फेरे में चुनकर भेजी गई सरकारों के नुमाइंदे देखो करते हैं कैसे कैसे अजूबे फैसले किसान अन्नदाता भी कहते हैं जिसे पाई पाई के लिए मुहताज खड़ा है सिसक रही हैं फसलें तैयार खेतों में घुटती हैं सिसकियां फाइलों के ढेरों में चुनकर भेजी गई सरकारों के नुमाइंदे बनकर दलाल खड़े हैं बांधे हाथ अपने कॉर्पोरेट चंद अमीरों के तहखाने में कैद हैं लक्ष्मी भी हरे हरे नोटों में साल भर में 781 किसान मरे हैं अब तक मौत उनकी भी होगी अब जांच के घेरे में सरकार ने कहा 483 मौत ही हैं असली साबित करो कि मरे हो मौत से अपनी मरना भी अब गुनाह हो गया है जैसे जब मौत ही खड़ी हो गई कटघरे में चुनकर भेजी गई सरकारों के नुमाइंदे फिर भी सेंकते हैं रोटी शवों के...

जल्लाद निजाम की खूनी साजिश...

जल्लाद निजाम की खूनी साजिश... जल्द ही एक नई स्टोरी पूरी होगी...नई फिल्लम भी बनेगी। क्या गजब का प्लॉट है...। सुनिए....ध्यान दीजिए...गौर फरमाइए...। कैसे लगी यह स्टोरी...बताइए जरूर...।  किसी राज्य में अचानक रहस्यमयी घटनाएं होने लगती हैं...। कोई समझ नहीं पाता ...हो क्या रहा है...।  एक राज्य का गृहमंत्री, राजनीति और सामाजिक विषयों पर अच्छी पकड़ भी...। लेकिन किसी महत्वाकांक्षी छुटभैये ने उस चतुर गृह मंत्री को फांस लिया। कभी राज्य के सीएम पद के दावेदार रहनेवाले गृह मंत्री की अचानक हत्या हो जाती है... वह भी तब, जब छुटभैया अचानक से सीएम की कुर्सी हथिया लेता है.... छुटभैया सीएम की महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है...युवा गृह मंत्री से तकरार भी....। इंजीनियर की डिग्री हासिल करनेवाले युवा गृहमंत्री की हत्या में शेयर बाजार में दलाली करनेवाले एक शख्स और सीएम का नाम सामने आता है...। शेयर मार्केट के दलाल के पास सीएम के कुछ गुप्त राज हैं....उस राज के बदले सीएम झुकता जाता है...। फ्लैश बैक में युवा गृह मंत्री की कहानी....          वह मुख्यमंत्री के दाहिने हाथ बन कर...

नरभक्षी नक्सली कहीं की?

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नरभक्षी नक्सली कहीं की? नरभक्षी नक्सली कहीं की? हम आदम जात के बनाए गए इस कंक्रीट के जंगलों में विचरण क्यों कर रही है...यह तेरा इलाका नहीं रहा अब। देखती नहीं अब इन कंक्रीट के जंगलों में नरपशु रहते हैं । यहां आने से पहले तुझे भी डरना चाहिए था। इंसान तो क्या, भगवान-अल्लाह- गॉड भी कांपते हैं, यहां इन कंक्रीट के जंगलों में आने से पहले। फिर तू क्यों मुंह उठा कर चली आती है। आएगी तो जान से जाएगी. समझ ले...।            टी वन (T1) बाघिन, तुमसे ज्यादा खूंखार तो आदम जात निकला। बेशक तुम्हें खुद के ज्यादा हिंसक और नरभक्षी होने का गुमान रहा हो, लेकिन सच तो यह है कि तुमसे भी ज्यादा शातिर, घातक, हिंसक, क्रूर और नरभक्षी जीव अब इन कंक्रीट के जंगलों में पाए जाने वाले आदम जात ही हैं। देखो तो सही, इनकी मजाल। किस चालाकी से तुम्हारे ही जंगलों में, तुम्हारे ही घरों में घुस कर तुम्हारा ही कत्ल कर आते हैं। कत्ल करने से पहले निवाला भी छीन लेते हैं।           पहाड़ों और जंगलों को हड़प कर हजम कर जानेवाले इन आदमजात को पहचानने में ...

सीवर में सफाईकर्मी की मौत

सीवर में सफाईकर्मी की मौत 

विकास पंगु हो गया है... धक्का देने के लिए विनाश जरूरी है...

विकास पंगु हो गया है... धक्का देने के लिए विनाश जरूरी है... साल 2019 के चुनाव में राम मंदिर का मुद्दा अहम रहेगा। प्रधान चुकीदार के सारे विकास दावे एक तरफ और मंदिर का मुद्दा एक तरफ होगा। काश कि आज श्रीमान मिसिरा जी होते, तो राम मंदिर का निर्माण का फैसला सुना ही देते। लेकिन गोगोई जी पर असर नहीं हो रहा है शायद, वे भगवान के नाराज होने से भी नहीं डरते, तभी तो निडर होकर फैसला ले लिया और अगले साल के लिए सुनवाई टाल दिया है। हो सकता है, अगली बेंच में ही वे न हों...। शाह और स्वामी ने पहले ही चेता दिया है...ऐसा कोई भी फैसला सुको न करे, जिसको लागू ही नहीं किया जा सके। जस्टिस लोया याद हैं किसी को....। विकास पंगु हो गया है, इसे आगे बढ़ाने के लिए घटिया नेताओं की इस फौज ने अब विनाश के रास्ते पर चलने का फैसला ले लिया है। विनाश के रास्ते चल कर ही तो सत्ता सुंदरी का स्वाद चखा है। चड्ढी गैंग की सत्ता की हवश अब केवल और केवल विनाश, सांप्रदायिकता और नर संहार के रास्ते ही तो बुझेगी। ऐसा प्रतीत हो रहा है - साल 2019 का चुनाव रक्तों की नदी से गुजरते हुए लड़ा जाएगा...। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को...

जांच एजेंसी की साख पर बट्टा या राजनीतिक बिछात में पिसती सीबीआई

जांच एजेंसी की साख पर बट्टा... या राजनीतिक बिछात में पिसती सीबीआई देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की साख एवं प्रतिष्ठा पर हमेशा से ही सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से जांच एजेंसी के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच आपसी लड़ाई सामने आई है, उससे जांच एजेंसी की विश्वसनीयता और भी कमजोर हुई है।   सीबीआई के बारे में धारणा बन गई है कि वह राजनीतिक रूप से इस्तेमाल होती है और सरकार अपने विरोधियों को काबू में रखने के लिए उसका इस्तेमाल करती रही है। जयललिता, लालू, मायावती और मुलायम सिंह यादव की आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई की भूमिका ने इस धारणा को और मजबूत किया है। इन सबके बावजूद विगत वर्षों में इस संस्था में लोगों का भरोसा डिगा नहीं है। मामले की निष्पक्ष जांच के लिए लोग सीबीआई जांच की मांग उठाते रहे हैं। यह भरोसा ही सीबीआई की साख एवं विश्वसनीयता का आधार है लेकिन दो उच्च अधिकारियों की घूसखोरी के पूरे प्रकरण ने जांच एजेंसी की उसी साख, विश्वसनीयता एवं निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और उसके विशेष निदेशक राकेश अस्थान...

आयातित देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी है

  आयातित न्याय देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी है... बचपन से ही पढ़ते और सुनते आ रहे हैं - न्याय में असमानता न हो इसलिए वे आँख पर पट्‍टी बाँधकर ही न्याय तौलती है। लेकिन तराजू का पलड़ा सम है यह कैसे पता चल सकेगा। आंखें तो बंद हैं न्याय तौलनेवाली पत्थर की देवी के। फिर केवल सुनकर ही निर्णय कैसे हो सकेगा। झूठ का पलड़ा भारी ही रहता है तो फिर सच कैसे मजबूत होगा। प्रयास को सफलता मिलेगी कैसे? यह देखने सुनने के बाद भी न्याय अन्याय का फैसला कैसे किया जा सकता है? क्या वैसे ही, जैसे सदियों से फैसला किया जाता रहा है। मनुवादी फैसलों के तहत...। न्यायपालिका, कार्य पालिका में भी तो वर्णवादी व्यवस्था की भरमार है, तो फिर आयातित देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी है, यहां के मूल निवासियों की भाषा को कैसे समझ सकेंगी विदेशी मूल की न्याय देवी।           कानून और कचहरी का जब भी जिक्र होता है ,न्याय की देवी की एक मूरत सामने होती है। साथ ही उभरती है – आँखों पर पट्टी बंधी, एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवारधारी देवी की मनमोहक छवि। लेकिन भारत में इस न्याय की देवी का नाम क्या...

सतीत्व नष्ट होते ही देवताओं की विजय का मार्ग प्रशस्त होगा...

सतीत्व नष्ट होते ही देवताओं की विजय का मार्ग प्रशस्त होगा... वेदों- पुराणों में सती देवियों और महिलाओं का खूब जिक्र आता है। देवी देवताओं और देवताओं के राजा इंद्र का भी नाम आता है। इन कथाओं में असूरों और दानवों के साथ ही मानवों का भी विचित्र कथानक किया गया है। खासकर असूरों और दानवों को खल पात्र बताया गया है। लेकिन रोचक बात यह है कि इन खल पात्रों की पत्नियों को सती बताने में कोताही नहीं बरती गई है। इन खल पात्रों की पत्नियों के सतीत्व के कारण देवताओं की पराजय होती रहती थी। देवराज इंद्र तक परास्त हो जाते थे, केवल सतीत्व के कारण। फिर इन खल पात्र चरित्रों को हराने के लिए महान बलशाली त्रिदेवों की मदद ली जाती थी। इन त्रिदेवों का काम होता, संसार की रक्षा करना। त्रिदेवों में से एक देव संहार कर्ता, एक देव  पालनकर्ता व रक्षक के रूप में जिम्मेदारी संभालता औऱ एक देव सृष्टि पैदा करनेवाला जिम्मा संभालता था। तो रक्षक की भूमिका निभानेवाले देव ही अक्सर देवराज के निवेदन को स्वीकार करता। देवराज के निवेदन पर देवताओं के रक्षक असूरों और दानवों की पत्नियों का सतीत्व नष्ट करते और उसके बाद देवताओं की वि...

मुरझाए देवी देवताओं, आवाहन कबूल हो

मुरझाए देवी देवताओं, आवाहन कबूल हो... सर्वव्यापकता ही तो ईश्वर की खूबी है। हर जगह, थल में नभ में, जल में। आकाश में, पाताल में, उभयाचल में। जहां देखो, वहां सर्वव्यापी ईश्वर जी साक्षात विराजमान हैं। आकाशगंगा और धरती के कण कण में व्यापकता नजर आती है। कितनी आश्चर्यजनक बात है न, इस तुच्छ धरती पर सर्वशक्तिमान जगतपिता ईश्वर को भी गढ़ा गया है। संसार बनानेवाले की रचना भी तो कोई आम नहीं, खास नहीं, बल्कि कोई जन्मजात मुख से पैदा होनेवाला एकमात्र खास तबका ही तो कर सकेगा न, सो यह काम वह बखूबी करता ही आ रहा है। तभी तो आज तक अनवरत भगवानों को गढ़े जाने का क्रम अविरत चल ही रहा है। थमने का नाम नहीं ले रहा। कहते हैं, खुद जगत की रचना करनेवाले भगवान जी ने ही आशीर्वाद दिया है। आज भगवान जी कोमा में हैं। मंदिरों में बूत बने हुए हैं। मुरझाए देवी देवताओं, आवाहन कबूल हो- जागिए। नहीं तो बाजार में कोई नया देवता पैदा हो जाएगा। हाल फिलहाल कोई नया देवता पैदा नहीं हुआ है बुद्ध के बाद।     देखिए न इस चराचर जगत में आम लोग मानव वह भी किसी स्त्री योनि से ही पैदा होते हैं, इसलिए उनमें ज्ञान और बुद्ध...

...और जिंदा हो उठी कार्यकर्ता की आत्मा

...और जिंदा हो उठी कार्यकर्ता की आत्मा " गरीबों की आवाज बुलंद करनेवाले.....  गरीबों के दिलों में बसने वाले लोकप्रिय उम्मीदवार अपने साहेब जी को पूर्ण बहुमत से विजयी करें..." हर घर में इक मंदिर है हर मूरत में साहब हैं...। जीतेंगे भई जीतेंगे... साहब जी अपने जीतेंगे...। जीतेंगे भई जीतेंगे... साहब ही तो जीतेंगे... जी हां, चुनाव आते ही, गली गली, मुहल्ले मुहल्ले तक में नारों की झड़ी लग जाती है। गांव से लेकर शहर तक में चुनावी रंग एक जैसे ही तो होते हैं। कार्यकर्ताओं का जोश समर्थकों की भीड़। सब एक ही जैसी तो होती है। चुनावी घोषणा के लिए नारे लगाने वाली उस भीड़ में भी एक ऐसा इंसान होता है, जिस पर सभी कार्यकर्ता भरोसा करते हैं। उसी पर भरोसा कर के तो इतनी भीड़ जुटती रही है हर चुनाव में, हर जुलूस में। चुनाव आते ही दिन भर पैरों में मानों चरखी फिट कर दी जाती है। एक दिन में ही पाच- छह गांवों की सभाओं को निपटाने की ताकत तभी तो आती है। मतदान का दिन जैसे जैसे नजदीक आता है, कार्यकर्ताओं का जोश भी उतना ही बढ़ता चला जाता है।  गांव गांव में बूथ का इंतजाम करना, मतदाता सूचियों को अपडेट क...

गिरने की होड़ लगी है, कौन कितना गिरता है...

गिरने की होड़ लगी है, कौन कितना गिरता है... तो नसीब वाले बापजी के अंडभक्तों, बधाई हो।  कोई सड़क छाप जुआरी भी नहीं हैं। रिपुटेड लोग हैं भाई। पहले राजा महाराजा लोग खुलेआम जुआ खेलते हैं, अब कंपनियों की ओर से दलाल खेलते हैं। कारपोरेट जगत की ओर से मंत्री नेता दलाली करते हैं, चाल चलते हैं। बधाई हो। देश का राष्ट्रीय रुपया लगातार गिर रहा है। कभी रुपये की साख की तुलना दिल्ली सम्राट की साख से की जाती थी। आज नहीं की जाती, सबको डर है, गर चूं की तो सरकारी तोता रगड़ कर रख देगा। अब तो सरकारी तोते की कई प्रजातियां ईजाद कर ली गई हैं।       तो अंडभक्तों, बधाई हो। इतनी महंगाई में भी पेटरोल - डीजल तुम्हारे घरों में 30 रुपए की दर से ही मिल रहे हैं। भई, खूब मजे ले लेकर विरोधियों को चिढ़ा रहे हो। इधर, रुपया भी तुम्हारे बाप जी की तरह लगातार नीचे गिरती जा रही है। दोनों में होड़ लगी है, कौन कितना नीचे गिरता है।        तुम्हारे बापजी ने तो साढ़े चार साल में डबल सेंचुरी लगा दी है भाई तमाम तरह की घोषणाओं कर कर के। और रुपया और पेटरोल डीजल भी शतक बनाने के करीब है। इस लिह...

मानसिक रूप से गुलाम क्या विद्रोह करेगा...

मानसिक रूप से गुलाम क्या विद्रोह करेगा... आज का जो माहौल है और जो हालात पैदा किया जा रहा है, उसे देखते हुए लग रहा है कि जो सत्ता में बैठे लोग हैं, वे खुद ही नहीं चाहते कि कोई दबा कुचला वर्ग उसके खिलाफ जाए, उसकी आज्ञा का उल्लंघन करे। वह रोटी बोटी और नोटों के बंडल फेंक कर ऐसे लोगों को साम दाम दंड भेद से गुलाम बनाये रखना चाहता है। इसी लिए शिक्षा की बुनियाद को ही खोखला कर दिया जा रहा है। मानसिक रूप से गुलाम क्या विद्रोह करेगा। सवर्ण वर्ग तो पहले से ही शासक रहा है, लेकिन बाद में जो पिछड़े, ओबीसी और दलित वर्ग से थोड़ा बहुत नेतृत्व उभरा और सत्ता में भागीदार हुआ है, उसने भी अपना ही स्वार्थ साथा।     तो पढ़ लिख कर जो यह दलितों व पिछड़ों का उंगली पर गिनने लायक वर्ग पैदा किया गया है न यह अब कुलीन अभिजात्य सवर्ण लोगों के समुदाय में शामिल होने की भरसक कोशिश में लगा हुआ है। लेकिन चालाक सवर्ण समुदाय जो है, वह ऐसे लोगों का भलीभांति अपने हित के लिए उपयोग कर ले रहा है। यह चाल नव सवर्ण वर्ग के दलितों को शायद नहीं पता। इनकी हालात पाकिस्तान के उन मुजाहिदों की तरह हो गई है, जिसे पाकिस्तान का उच्...

एक खत बच्चों के नाम...

अपना दायरा बढ़ाते बढ़ाते अपनों से दूर हो जाते हैं बच्चे... प्रिय बच्चे, यह पत्र (मोबाइल मेसेज) रात को 2 बजे एक बाप अपनी बेटी / अपने बेटे के लिए लिख रहा है। कृपया पूरा पढ़ लेना। फिर ठंडे दिमाग से सोचना। आज के बच्चे खुद पर और अपने दोस्तों पर ज्यादा और अपने पैरेंट्स और भाई बहनों पर कम विश्वास करते हैं। दोस्त जितने जरूरी हैं, उतना ही ज्यादा जरूरी है परिवार। परिवार मां बाप, भाई बहन से ही बनता है। रिश्तेदारों पड़ोसियों से बनता है समाज। हमारा समाज जितना बड़ा होगा, उतना ही बड़ा हमारा खुद का दायरा भी बड़ा होगा, सोचने समझने की काबिलियत भी बढ़ेगी। लेकिन बच्चे अपना दायरा बढ़ाते बढ़ाते बच्चे कब अपने परिवार से, अपने मां बाप और भाई बहन से दूर हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। अपने परिवार को बचाए रखना।      मां बाप के लिए बच्चे ही एकमात्र सहारा होते हैं। दुनिया के सब मां बाप की एक ही इच्छा होती है कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर स्वावलंबी बनें और बेहतर जिंदगी जियें, एक सफल इंसान बनें। मां बाप ने अपने जीवन मे जो तकलीफें झेली हैं, जो दुःख सहे हैं, जो गलतियां की हैं, उससे उनके बच्चे सबक लें और लापरवाही ...