पत्थर के भगवानों से कुछ पाने की उम्मीद अब जो हालात पैदा किए जा रहे हैं उससे प्रतीत होता है कि जिसने भी थोथी किताबों का विरोध किया, जिसने भी किस्से कहानियों पर उंगली उठाई, ऐसे पढ़े लिखे लोगों को अब शहरी आतंकवादी या वामपंथी घोषित कर दिया जाएगा , किया भी जा रहा है। दुनिया नित नए अन्वेषण कर रही है, शोध कर रही है। प्रौद्योगिकी, विज्ञान, अंतरिक्ष, मेडिकल हर जगह अपना परचम लहरा रहे हैं। लेकिन हमारे सो कॉल्ड महान देश, जहां कभी वानर रीछ भालू गिद्ध व अन्य जानवर कभी संस्कृत बोला करते थे, हवा में उड़ सकते थे, धरती से 100 गुना प्रकाशवान गोले को, जिसे सूरज भगवान कहते हैं , उन्हें एक वानर बालक निगल जाता है, उस महान देश में इस तरह की कोरी कल्पनाओं में ही खुद को धन्य मानने की जुगाड़ लगाने में व्यस्त है। आज हमारे महान देस का वासी पत्थर के भगवानों से कुछ पाने की उम्मीद पाले बैठा है। किसी आश्चर्य चमत्कार होने की आस लगाए बैठा है। निर्जीव पत्थरों की मूरत में आस्था ढूंढता है। इस नकली आस्था के चक्कर में न जाने कितनी लाशें बिछा दी गई हैं, न जाने कितनों का खून बहा दिया गया है। असल में कुछ शातिर व स्वार्थी...
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