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सरकारी फाइलों में मौत फंसी है झमेलों में

 सरकारी फाइलों में मौत                          फंसी है झमेलों में  सरकारी फाइलों में देखो तो मौत भी फंसी है पात्र और अपात्र के झमेलों में चुनकर भेजी गई सरकार के नुमाइंदे करते हैं कैसे कैसे अजूबे फैसले सरकारी फाइलों में अनगिनत लाशें आज भी राह देखते पड़ी है मुआवजों के फेरे में चुनकर भेजी गई सरकारों के नुमाइंदे देखो करते हैं कैसे कैसे अजूबे फैसले किसान अन्नदाता भी कहते हैं जिसे पाई पाई के लिए मुहताज खड़ा है सिसक रही हैं फसलें तैयार खेतों में घुटती हैं सिसकियां फाइलों के ढेरों में चुनकर भेजी गई सरकारों के नुमाइंदे बनकर दलाल खड़े हैं बांधे हाथ अपने कॉर्पोरेट चंद अमीरों के तहखाने में कैद हैं लक्ष्मी भी हरे हरे नोटों में साल भर में 781 किसान मरे हैं अब तक मौत उनकी भी होगी अब जांच के घेरे में सरकार ने कहा 483 मौत ही हैं असली साबित करो कि मरे हो मौत से अपनी मरना भी अब गुनाह हो गया है जैसे जब मौत ही खड़ी हो गई कटघरे में चुनकर भेजी गई सरकारों के नुमाइंदे फिर भी सेंकते हैं रोटी शवों के...

जल्लाद निजाम की खूनी साजिश...

जल्लाद निजाम की खूनी साजिश... जल्द ही एक नई स्टोरी पूरी होगी...नई फिल्लम भी बनेगी। क्या गजब का प्लॉट है...। सुनिए....ध्यान दीजिए...गौर फरमाइए...। कैसे लगी यह स्टोरी...बताइए जरूर...।  किसी राज्य में अचानक रहस्यमयी घटनाएं होने लगती हैं...। कोई समझ नहीं पाता ...हो क्या रहा है...।  एक राज्य का गृहमंत्री, राजनीति और सामाजिक विषयों पर अच्छी पकड़ भी...। लेकिन किसी महत्वाकांक्षी छुटभैये ने उस चतुर गृह मंत्री को फांस लिया। कभी राज्य के सीएम पद के दावेदार रहनेवाले गृह मंत्री की अचानक हत्या हो जाती है... वह भी तब, जब छुटभैया अचानक से सीएम की कुर्सी हथिया लेता है.... छुटभैया सीएम की महत्वाकांक्षा बढ़ती जाती है...युवा गृह मंत्री से तकरार भी....। इंजीनियर की डिग्री हासिल करनेवाले युवा गृहमंत्री की हत्या में शेयर बाजार में दलाली करनेवाले एक शख्स और सीएम का नाम सामने आता है...। शेयर मार्केट के दलाल के पास सीएम के कुछ गुप्त राज हैं....उस राज के बदले सीएम झुकता जाता है...। फ्लैश बैक में युवा गृह मंत्री की कहानी....          वह मुख्यमंत्री के दाहिने हाथ बन कर...

नरभक्षी नक्सली कहीं की?

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नरभक्षी नक्सली कहीं की? नरभक्षी नक्सली कहीं की? हम आदम जात के बनाए गए इस कंक्रीट के जंगलों में विचरण क्यों कर रही है...यह तेरा इलाका नहीं रहा अब। देखती नहीं अब इन कंक्रीट के जंगलों में नरपशु रहते हैं । यहां आने से पहले तुझे भी डरना चाहिए था। इंसान तो क्या, भगवान-अल्लाह- गॉड भी कांपते हैं, यहां इन कंक्रीट के जंगलों में आने से पहले। फिर तू क्यों मुंह उठा कर चली आती है। आएगी तो जान से जाएगी. समझ ले...।            टी वन (T1) बाघिन, तुमसे ज्यादा खूंखार तो आदम जात निकला। बेशक तुम्हें खुद के ज्यादा हिंसक और नरभक्षी होने का गुमान रहा हो, लेकिन सच तो यह है कि तुमसे भी ज्यादा शातिर, घातक, हिंसक, क्रूर और नरभक्षी जीव अब इन कंक्रीट के जंगलों में पाए जाने वाले आदम जात ही हैं। देखो तो सही, इनकी मजाल। किस चालाकी से तुम्हारे ही जंगलों में, तुम्हारे ही घरों में घुस कर तुम्हारा ही कत्ल कर आते हैं। कत्ल करने से पहले निवाला भी छीन लेते हैं।           पहाड़ों और जंगलों को हड़प कर हजम कर जानेवाले इन आदमजात को पहचानने में ...

सीवर में सफाईकर्मी की मौत

सीवर में सफाईकर्मी की मौत 

विकास पंगु हो गया है... धक्का देने के लिए विनाश जरूरी है...

विकास पंगु हो गया है... धक्का देने के लिए विनाश जरूरी है... साल 2019 के चुनाव में राम मंदिर का मुद्दा अहम रहेगा। प्रधान चुकीदार के सारे विकास दावे एक तरफ और मंदिर का मुद्दा एक तरफ होगा। काश कि आज श्रीमान मिसिरा जी होते, तो राम मंदिर का निर्माण का फैसला सुना ही देते। लेकिन गोगोई जी पर असर नहीं हो रहा है शायद, वे भगवान के नाराज होने से भी नहीं डरते, तभी तो निडर होकर फैसला ले लिया और अगले साल के लिए सुनवाई टाल दिया है। हो सकता है, अगली बेंच में ही वे न हों...। शाह और स्वामी ने पहले ही चेता दिया है...ऐसा कोई भी फैसला सुको न करे, जिसको लागू ही नहीं किया जा सके। जस्टिस लोया याद हैं किसी को....। विकास पंगु हो गया है, इसे आगे बढ़ाने के लिए घटिया नेताओं की इस फौज ने अब विनाश के रास्ते पर चलने का फैसला ले लिया है। विनाश के रास्ते चल कर ही तो सत्ता सुंदरी का स्वाद चखा है। चड्ढी गैंग की सत्ता की हवश अब केवल और केवल विनाश, सांप्रदायिकता और नर संहार के रास्ते ही तो बुझेगी। ऐसा प्रतीत हो रहा है - साल 2019 का चुनाव रक्तों की नदी से गुजरते हुए लड़ा जाएगा...। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को...

जांच एजेंसी की साख पर बट्टा या राजनीतिक बिछात में पिसती सीबीआई

जांच एजेंसी की साख पर बट्टा... या राजनीतिक बिछात में पिसती सीबीआई देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की साख एवं प्रतिष्ठा पर हमेशा से ही सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से जांच एजेंसी के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच आपसी लड़ाई सामने आई है, उससे जांच एजेंसी की विश्वसनीयता और भी कमजोर हुई है।   सीबीआई के बारे में धारणा बन गई है कि वह राजनीतिक रूप से इस्तेमाल होती है और सरकार अपने विरोधियों को काबू में रखने के लिए उसका इस्तेमाल करती रही है। जयललिता, लालू, मायावती और मुलायम सिंह यादव की आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई की भूमिका ने इस धारणा को और मजबूत किया है। इन सबके बावजूद विगत वर्षों में इस संस्था में लोगों का भरोसा डिगा नहीं है। मामले की निष्पक्ष जांच के लिए लोग सीबीआई जांच की मांग उठाते रहे हैं। यह भरोसा ही सीबीआई की साख एवं विश्वसनीयता का आधार है लेकिन दो उच्च अधिकारियों की घूसखोरी के पूरे प्रकरण ने जांच एजेंसी की उसी साख, विश्वसनीयता एवं निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और उसके विशेष निदेशक राकेश अस्थान...

आयातित देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी है

  आयातित न्याय देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी है... बचपन से ही पढ़ते और सुनते आ रहे हैं - न्याय में असमानता न हो इसलिए वे आँख पर पट्‍टी बाँधकर ही न्याय तौलती है। लेकिन तराजू का पलड़ा सम है यह कैसे पता चल सकेगा। आंखें तो बंद हैं न्याय तौलनेवाली पत्थर की देवी के। फिर केवल सुनकर ही निर्णय कैसे हो सकेगा। झूठ का पलड़ा भारी ही रहता है तो फिर सच कैसे मजबूत होगा। प्रयास को सफलता मिलेगी कैसे? यह देखने सुनने के बाद भी न्याय अन्याय का फैसला कैसे किया जा सकता है? क्या वैसे ही, जैसे सदियों से फैसला किया जाता रहा है। मनुवादी फैसलों के तहत...। न्यायपालिका, कार्य पालिका में भी तो वर्णवादी व्यवस्था की भरमार है, तो फिर आयातित देवी की आंखों पर तो पट्टी बंधी है, यहां के मूल निवासियों की भाषा को कैसे समझ सकेंगी विदेशी मूल की न्याय देवी।           कानून और कचहरी का जब भी जिक्र होता है ,न्याय की देवी की एक मूरत सामने होती है। साथ ही उभरती है – आँखों पर पट्टी बंधी, एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवारधारी देवी की मनमोहक छवि। लेकिन भारत में इस न्याय की देवी का नाम क्या...